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कैग की रिपोर्ट: इंडियन नेवी की कई परियोजनाओं में खामियां

Aug 16, 2017..Wednesday 3433 Posted by Admin
कैग की रिपोर्ट: इंडियन नेवी की कई परियोजनाओं में खामियां

 भारत का अपने दो पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद चल रहा है। वहीं डोकलाम में जारी विवाद के बाद हिन्द महासागर में चीनी युद्धपोत गश्त लगा रहे हैं। इस बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट मंय खुलासा हुआ है कि भारतीय सेना के पास युद्ध की स्थिति में सिर्फ 10 दिनों का गोला-बारूद की उपलब्ध है। इतना ही नहीं कैग ने अपनी रिपोर्ट में नौसेना को भी आड़े हाथों लिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, नौसेना ने चार पनडुब्बी रोधी वाहक युद्धक पोत के निर्माण में काफी देर की है।  युद्धक पोतों में नहीं लगे सेंसर  संसद में पेश की गई कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि नौसेना को सुपुर्द किए गए चार युद्धक पोतों में जरूरी अस्त्र एवं सेंसर प्रणाली नहीं लगाई गई, जिसके कारण वे अपनी पूरी क्षमता से प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं जिसकी परिकल्पना की गई थी।  पोत के डिजाइन में किए गए 24 बदलाव  कैग ने नौसेना के नौसेना डिजाइन निदेशालय की भी वाहक पोत की डिजाइन को अंतिम रूप देने में विलंब के लिए आलोचना करते हुए कहा कि स्वीकत डिजाइन में 24 बदलाव किए गए।  सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एवं इंजीनीयर्स लिमिटेड को परियोजना के लिए आशय पत्र 2003 में जारी किया गया था किन्तु पोत की डिजाइन में में व्यापक बदलाव 2008 तक चलता। नौसेना को पहला वाहक पोत जुलाई 2014 और दूसरा नवंबर 2015 में सौंपा गया। परियोजना के अनुबंध के अनुसार तीसरे वाहक पोत जुलाई 2014 में चौथा अप्रैल 2015 में सौंपा जाना था।  2007-08 में हुई 36 दुर्घटनाएं -कैग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया है कि 2007-08 में हुई 38 दुर्घटनाओं में नौसेना के पोत एवं पनडुब्बियां शामिल रहे। इससे बल की अभियानगत तैयारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसकी रिपोर्ट में कहा गया कि सुरक्षा मुद्दों से निबटने के लिए एक विशेष संगठन बनाया गया था। बहरहाल इसके लिए सरकार की मंजूरी का इंतजार है। कैग की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा, फंसे कर्ज वसूली से ज्यादा माफ कर रहे हैं बैंक  सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) की समस्या अनुमान से कहीं अधिक गंभीर है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक फंसे की वास्तविक राशि को कम करके दिखा रहे हैं। करीब दर्जन भर सरकारी बैंक ऐसे हैं जिन्होंने अपने फंसे कर्ज की राशि रिजर्व बैंक के अनुमान की तुलना में 15 प्रतिशत तक कम बतायी है। हकीकत यह है कि सरकारी बैंक फंसे कर्ज की राशि को वसूलने से ज्यादा माफ कर रहे हैं। बैंकों की स्थिति के बारे में यह चौंकाने वाला तथ्य नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है जिसे वित्त राज्य मंत्री अजरुन राम मेघवाल ने शुक्रवार को लोकसभा में पेश किया।  कैग ने यह रिपोर्ट ‘सरकारी क्षेत्र के बैंकों के पूंजीकरण’ का ऑडिट करने के बाद तैयार की है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया किया गया है कि बैंक अपने बलबूते बाजार से पूंजी जुटाने में नाकाम रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वर्ष 2018-19 तक 1,10,000 करोड़ रुपये बाजार से जुटाने का लक्ष्य दिया था। हालांकि इस लक्ष्य के मुकाबले बैंक जनवरी 2015 से मार्च 2017 के दौरान मात्र 7,726 करोड़ रुपये ही बाजार से जुटा पाए। कैग ने 2019 तक बाकी एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी बाजार से जुटाने की बैंकों की क्षमता पर आशंका भी जतायी है।  कैग रिपोर्ट में सबसे अहम बात जो सामने आयी है, वह यह है कि सरकारी बैंक फंसे कर्ज की वसूली करने की तुलना में इसे माफ अधिक कर रहे हैं। सरकारी बैंकों ने वर्ष 2011-15 के दौरान भारी भरकम 1,47,527 करोड़ रुपये के फंसे कर्ज माफ किये जबकि सिर्फ 1,26,160 करोड़ रुपये की वसूली होनी थी।  रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज की राशि तीन साल में बढ़कर तीन गुना हो गयी। मार्च 2014 में बैंकों का सकल एनपीए 2.27 लाख करोड़ रुपये था जो मार्च 2017 में बढ़कर 6.83 लाख करोड़ रुपये हो गया। हालांकि इससे चौंकाने वाली बात यह है कि कई सरकारी बैंक अपनी एनपीए की वास्तविक राशि नहीं दिखा रहे हैं। सरकारी बैंक एनपीए की राशि को कम करके दिखा रहे हैं। कैग रिपोर्ट के अनुसार दर्जन भर सरकारी बैंकों ने अपना जितना एनपीए बताया, वह आरबीआइ के अनुमान से 15 प्रतिशत कम था।  कैग ने सरकार की ओर से बैंकों को दी गयी पूंजी की प्रक्रिया में भी कई तरह की खामियां उजागर की हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार बैंकों को जो पूंजी दे रही है, उसका उपयुक्त इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र होना चाहिए।  क्या होता है एनपीए?  एनपीए यानी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का मतलब फंसे कर्ज से है जिससे बैंक को अब कोई आय नहीं हो रही है। दरअसल जब बैंक के किसी लोन खाते में 90 दिन तक ब्याज या मूलधन की किश्त का भुगतान नहीं होता है तो उसे एनपीए करार दे दिया जाता है। हालांकि फसली ऋण के मामले में यह सीमा दो फसलों की अवधि के बराबर है। अगर फसल दीर्घावधि की है तो यह सीमा एक फसल अवधि के बराबर है। CAG की रिपोर्ट- फसल बीमा योजना में कई खामियां  नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी नई रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' में कई खामियों को उजागर किया है. उन्होंने कहा कि राज्यों द्वारा प्रभावित किसानों को बीमा राशि मुहैया कराने में की जा रही देरी के चलते किसानों को समय से वित्तीय मदद प्रदान करने का लक्ष्य बाधित हुआ है.  संसद में शुक्रवार को पेश की गई कैग की रिपोर्ट में फसल बीमा योजना के तहत कई कमियों के बारे में बताया. इसमें बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा किसानों के खातों में बीमा राशि जमा करने अनियमितता सहित कई और खामियों का उल्लेख किया गया है. साथ ही राज्य सरकारों को इस संबंध में उनके लिए आवंटित धनराशि समय पर देने के लिए एक प्रणाली विकसित करने की सिफारिश भी की गई है.  कैग का यह भी कहना है कि कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) निजी कंपनियों को धनराशि देने से पहले उनके दावों के सत्यापन में तत्परता दिखाने में असफल रहा है.  बुआई के क्षेत्रफल और बीमित क्षेत्रफल से जुड़े आकड़ों में विसंगति को रेखांकित करते हुए सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, "राज्य सरकारों द्वारा इस संदर्भ में एआईसी को मुहैया कराए गए आंकड़ों की सत्यता को सत्यापित नहीं किया जा सका है. केंद्र सरकार ने पिछले साल खरीफ की फसल की बुआई के दौरान पीएमबीएफवाई योजना शुरू की थी और पिछली योजना में सुधार कर इसे मौसम आधारित फसल बीमा योजना का रूप दिया था.  पीएमबीएफआई के तहत किसानों को खरीफ फसलों के लिए बीमा राशि का सिर्फ दो फीसदी, रबी फसल के लिए बीमा राशि का सिर्फ 1.5 फीसदी और बागवानी तथा नकदी फसलों के लिए बीमा राशि का सिर्फ पांच फीसदी देना होता है, जबकि शेष राशि केंद्र सरकार और राज्य सरकार बराबर मात्रा में वहन करती है.  कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जितने किसानों पर सर्वेक्षण किया गया, उनमें से दो तिहाई (66.66 फीसदी) किसानों को इस योजना की जानकारी ही नहीं थी. बता दें कि योजना के तहत लाभान्वित किसानों की संख्या बेहद कम पाई गई, जबकि ऋण न लेने वाले किसानों को नजरअंदाज किया गया.  कैग ने योजना की निगरानी और योजना के क्रियान्वयन की निगरानी, नियमित मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करने तथा राज्य स्तरीय तथा जिला स्तरीय समितियों को बांटे गए कार्यो के संपादन के लिए स्वतंत्र एजेंसी के गठन में असफल रहने के लिए भी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की आलोचना की है. साथ ही कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि राज्य सरकारों द्वारा फसली जमीन से संबंधित आंकड़े जारी करने और वित्तीय एजेंसियों द्वारा दावों का निपटारा करने में देरी की बात सामने आई है.  कैग रिपर्ट में यह भी कहा है कि सरकारों को ऋण देने वाले बैंकों , वित्तीय संस्थानों और बीमा एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली सूचनाओं पर निर्भर रहना होता है, क्योंकि योजना में बीमित किसानों का डाटाबेस तैयार करने का प्रावधान ही नहीं रखा गया है Download pdf to Read More

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