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बांध विवाद: केरल के जवाब का प्रत्युत्तर देने के लिये न्यायालय ने तमिलनाडु को दिया वक्त

Aug 09, 2017..Wednesday 583 Posted by Admin
बांध विवाद: केरल के जवाब का प्रत्युत्तर देने के लिये न्यायालय ने तमिलनाडु को दिया वक्त

न्यायालय ने तमिलनाडु को उसकी याचिका का प्रत्युत्तर दायर करने के लिये तीन हफ्रते का समय दिया। तमिलनाडु ने अपनी याचिका में पड़ोसी राज्य केरल पर आरोप लगाया था कि वह उसे मुल्लापेरियार बांध के रऽरऽाव की इजाजत नहीं दे रहा। तमिलनाडु ने चार मई को अपनी याचिका में इस मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू करने की मांग करते हुये कहा था कि यह तय हुआ था कि उसे बांध के रऽरऽाव का अधिकार होगा, जबकि इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केरल पुलिस की होगी। तमिलनाडु ने अपनी अर्जी में शीर्ष अदालत के फैसले को लागू कराने को लेकर दिशा-निर्देश देने की मांग की है। इसके अनुसार, शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय में तमिलनाडु को बांध के रऽरऽाव का अधिकार दिया है, जबकि केरल को सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है। इसके बावजूद मरम्मत कार्य की अनुमति नहीं दी जा रही है। इससे पहले तमिलनाडु सरकार ने बांध की सुरक्षा के लिए सीआइएसएफ को तैनात करने की गुहार लगाई थी, जिस पर शीर्ष अदालत ने फटकार लगाई थी। सर्वाेच्च न्यायालय ने 7 मई, 2014 के फैसले में मुल्लापेरियार बांध को सुरक्षित करार दिया था। साथ ही तमिलनाडु सरकार को बांध को मजबूत करने का कार्य ऽत्म होने के बाद पानी का जलस्तर 142 से 152 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी थी। केरल ने इस फैसले को चुनौती दी थी, जिसे ऽारिज कर दिया गया था। पेरियार नदी पर बने इस बांध का निर्माण कार्य 1895 में पूरा हुआ था। इडुक्की जिले (केरल) में स्थित 1200 फीट लंबे बांध पर तमिलनाडु का स्वामित्व है। मुल्लापेरियार बांध केरल में पेरियार नदी पर स्थित है, लेकिन बांध एक अवधि के पट्टðे के अधीन, पड़ोसी तमिलनाडु राज्य द्वारा नियंत्रित और संचालित है। बांध का उद्देश्य, पेरियार नदी के पानी हटाने के लिए था क्योंकि यह त्रवणकोर क्षेत्र में बाढ़ के कारण होता था। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान, त्रवणकोर के महाराजा और मद्रास के लिए राज्य के सचिव के बीच एक 999 साल के पट्टðे का समझौता किया गया, जो 40,000 रुपये की एक वार्षिक किराया के लिए मुल्लापेरियार की सभी जल पर मद्रास को अधिकार प्रदान करता है। केरल ने बांध सेवा मुत्तफ़ करने और एक नया बांध निर्माण सिफारिश की है। लेकिन पड़ोसी तमिलनाडु जमकर कदम का विरोध किया है, क्योंकि यह बांध संचालित करने का अनुकूल विशेषाधिकार ऽो सकते हैं जो पहली बार अंग्रेजों ने 1895 में राज्य को दिया था । विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत में अभी भी स्पष्ट रूप से परिभाषित, कानूनी रूप से बाध्यकारी बांध विफलताओं के मामले में जवाबदेही तंत्र नहीं है। Download pdf to Read More

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